सोशल मीडिया फूलों की जगह आग बरसाने का काम भी कर रहा ?

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सोशल मीडिया नवीनतम युग का ऐसा अति आधुनिक और उपयोगी शस्त्र है, जिसके जितने लाभ हैं, उस से कई गुना अधिक नुकसान भी झेलने पड़ते हैं।

वैसे तो सोशल मीडिया की शुरुआत पारस्परिक संपर्क बढ़ाना और नजदीकी लगातार बरकार रखने के के लिए साहमने आई थी, किन्तु जैसे जैसे आधुनिकता बढ़ती गई उतनी ही गति से सोशल मीडिया के भिन भिन औजार जैसे कि फेसबुक्क, टविट्टर, गुगल +, वटसऐप, लिंकडइन इत्यादि की गिनती लगातार बढ़ती गई. इतना औजार का प्रयोग संपर्क साधनी से पश्चात व्यापार से जुड़्हनी शुरू हुई और विश्व के विकासशील देशों की ही ओर से नहीं, बलकि विश्व का हर छोटे-बड़े देशों की ओर से सोशल मीडिया का स्वागत उतसाह से किया जाता रहा। पारस्परिक संपरकता और व्यापारिक नेड़्हता का रिश्ता मजबूत और लगातार कड़ी दर कड़ी जुड़ता चला गया. जैसे हर रोग निवारक दवा का असर कहीं न कहीं नाकरातमक भी होता है, समुचित उस तरह सोशल मीडिया के औजार की ओर से कब रिश्तों में फूलों अत व्यापार में नोटों की बरसात की जगह आग सुलगणी शुरू कर दी, किसी को पता ही नहीं चला। जैसे बहते जल का बहाव मंद गति से तेज गति की तरफ़ चला जाता है और अहसास नहीं होता, अथवा कह डालए धरती तीवर गति से घूमती है, पर अहसास नहीं होता, क्युंकि हम आदी हो चुके हैं, जैसे बदबू और कौड़ेपण की आदत हो जाने से पश्चात इंसान की सूँघन शक्ति और समझ शक्ति एक निरधार्त आयाम पर टिक जाती है, जहाँ खुशबू और खुशबु की पहचान इंसानी इन्द्रिआं छोड़ देती हैं, भाव कि सोच कानसटैंट हो जाती है। बस यह हुआ सोशल मीडिया से, इस के औजार ने मनुष्य की सोच को कानसटैंट कर दिया, भाव स्थिर कर दिया। जिस से आज का मनुष्य चाहे वह किसी भी वर्ग, उम्र का हो, उस की निरभरता सोशल मीडिया पर इतनी बढ़ चुकी है कि परिवारक सदस्य से अधिक नजदीक वटसऐप, फेसबुक्क इत्यादि लगते हैं। जितना औजार को दूर के रिश्ते, नजदीक करने के लिए हौंद में लाया गया था, इनके ही कारण आज नजदीकी रिश्ते दूर ही नहीं हुए बलकि लुप्त हो गए लगते हैं।

रिश्तों से हट कर अगर बात करें तो सोशल मीडिया को जहाँ सियासत के लिए बरता गया, वहां असत्य प्रसार के भी लिए इस की प्रयोग खुल कर हुआ. इस तरह जहाँ धर्म प्रचार के लिए बरता गया, वहां कूड़ प्रचार के भी लिए बड़े स्तर पर इस के औजार का प्रयोग खुल कर किया गया। जहां तक कि सोशल मीडिया के द्वारा युवकों को टारगैट्ट (लक्ष्य बनाने के लिए) करने के लिए विभक्त आतंकवादी और गरम खयाली धड़ेबंदियां की ओर से इस का सहारा बड़े स्तर पर लिया जा रहा है। इस का सब से बड़ा खतरा उन बच्चों के सिर पर मंडरा रहा है, जो अभी नाबालग है, पर उन के माता-पिता की ओर से लाड़-प्यार वश बच्चों की जरूरतों को मुख्य रखते हुए आधुनिक युग के पदचिन्ह में पैर डालते हुए छोटी उम्र में ही अपने बच्चों को इस आधुनिकता से जोड़्ह दिया। इस से बच्चों का शोषण होने का खतरा जहाँ बढ़ा है, वहां इस से उन का गुंमराह होना अथवा ऐसे प्रचार का शिकार होना अघिक संभावित बन जाता है, जो उन को जिंदगी के चकाचौंध के लालच, आतंकवाद, देह व्यापार, मानव तस्करी जैसे दानवी कारिंदों का शिकार बनाता है।

जे इस विषय को और संजीदगी से सोचा जाये तो हैरानी होगी कि, किस तरह हर सोची बात को प्रचारने के लिए पहले कुछ सत्य घटनाओं का हवाला दिया जाता है और जब विश्वास को ठोस कर लिया जाता है तो अचानक सोशल मीडिया पर कोई ऐसी पोसट अथवा मैसज प्राप्त होता है जो कि शुरू से ही असत्य है, झूठ प्रचार है, पर उस को सत्य मान लिया जाता है, क्युंकि उस का आधार होता हुआ पहले वाला संदेश, जिसे गुंमराह करने की लिए सीढ़ी के माफ़िक बरता गया था. ऐसी कार्रवाइयों का आज के समय में सब से अधिक लाभ ले रहा हैं दंगाकारी, जो मजहबी जुदाई पैदा कर दंगे दहकाने की ताक में रहते हैं अथवा पिछोकड़ में हुईं दंगाकारी घटनाओं को सियासी रूप दे दुफाड़ पैदा करना, सियासी घोल करवाना, जहां तक कि लोगों की आज़ादी पर हल्ला बोल नये राज्यों की हौंद को खड़ा करना अथवा देश की आखंडता पर हमला करने से भी नहीं चूकते.

बीते कुछ समय से जैसे भारत में सोशल मीडिया के प्रयोग में रिकार्ड तोड़ वृद्धि हुई है, उस तरह इस के दुर्वरतों ने भी संपूर्ण हदें पार कर दीं हैं। संदेशा किसी भी विषय से जुड़ा हो उस को बिना पढ़े, खोले, बिना सोचे शेयर करने की होड़ इतनी बढ़ चुकी है कि गलत-वैध समझने का अवबोधन ज्ञानहीन हो चुका है। सोचें तो अनायास समझ आती है कि सिख युवकों को सोशल मीडिया के द्वारा जिस तरीक़े से रिफरैंडम 2020 अथवा खालिसतान लहर से जोड़ा जा रहा है, गरुप्प बनाये जा रहें हैं और जिसमें अतीव गरुप्प कूड़ प्रचार के लिए बरते जातें हैं। जिसमें मिथ्ये संदेशे भेजे जातें हैं, जिस में हिंदू – सिखों में पारस्परिक मत्तभेद को बढ़ाना और सिख लहर से जुड़े प्रचारकों को बदनाम करने के इलावा और कई विषयों पर बड़ा सूझ-बूझ से व्यूंतबंदी तहित काम किया जा रहा, पर कभी किसी ने यह नहीं सोचा कि हर बात एक तरफी ही क्यों दिखाई जा रही है ? शीशे का दूसरा भाग धुंधला हो सकता है, पर ज्ञान को धुंधला कर डालना और सोच को किसी का गुलाम कर डालना, संदेशों पर भरोसा करना कहां तक वैध हो सकता है?

इस संपूर्ण घटनाक्रम का शिकार युवक हो रहें है. जिन में सोचने की शक्ति तो है, पर जिंदगी का तजुर्बा जरूर कम है। इस का भरपूर लाभ कट्टड़पंथी जथेबंदी ले रही हैं, फिर चाहे वह किसी भी धर्म से जुड़ीं हों, क्युंकि उन को धर्म की परिभाषा समझ नहीं आती, पर वह आम लोगों के जीवन की परिभाषा को बर्बाद करने में लगे हैं, वह भी सिर्फ चंद सिक्कों और सियासी लाभ के लिए. एक बार फिर यह कहना गलत नहीं होगा कि दूर वालों को नजदीक करने वाला सोशल मीडिया अपनों को जिंदगी से दूर कर गया।