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आज की पश्चिमी सभ्यता में मानवीय विकास नहीं, बलकि गिरावटआई

रिश्तों में मिठास की जगह कड़वाहट ने ले ली

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आज की पश्चिमी सभ्यता, सभ्यता कहलवाने के पैमाने पर छोटी पड़ जाती है, क्युंकि इस में मानवीय विकास नहीं हो पाया, बल्कि मानवी निघार हुआ है। इस से पहले जितनी भी सभ्यता हौंद में आईं उन ने पूर्ण रूप में मानवी विकास में योगदान डाला, किन्तु आज की पश्चिमी सभ्यता में सिर्फ़ प्रौद्योगिकी और आरथिकता का ही विकास हुआ है और मानवीय विकास नहीं हो पाया। हम मानवीय विकास को कैसे नाप तौल सकते हैं? मानव में दोनों नीचे और उपर के केंद्र है। जब हम नीचे के केंद्रों से ऊपर के केंद्रों की तरफ़ बढ़ते हैं तो उस को मानवीय विकास कहा जा सकता है और जब हम ऊपरी केंद्रों से नीचे के केंद्रों की तरफ़ जाते हैं तो उस को मानवी गिरावट कहा जा सकता है। बीती दो सदियों में  पश्चिमी सरमाएदारी व्यसथा के तले हम तेज़ी से नीचे के केंद्रों की तरफ़ गये हैं. यह केंद्र मुख्य रूप से हमारी जिस्मानी हौंद को कायम रखने का लिए बने हैं। इन की तरफ़ झुकाव हमें ख़ुदगरज़, छोटी सोच में ग्रस्त, लालची, पेटू, अर्जक, प्रतिशोधी, अभिमानी और दिखावा करने वाला बनने की तरफ ले जाता है। ऊपरी केंद्र हमारी बौद्धिक और रूहानी उन्नती से जुड़े हुए हैं। वह हमारे अंदर ऊँचे स्तर की सोच प्रोत्साहित करते हैं। जैसे कि धैर्य, संयम, समर्पण, क़ुरबानी, मुआफी, नम्रता और प्रेम इत्यादि। आप को कोई बहुत बड़े ज्ञानी होने की भी जरूरत नहीं कि आप यह देख पाएं कि बीती दो सदियों में मानव अपने नीचे के केंद्रों की तरफ़ गिरा है। मानवीय विकास का एक बहुत अच्छा पैमाना मानवीय रिश्तों की दशा है। तकरीबन हर कोई इस बात से सहमत है कि मानवी रिश्तों तारें कमजोर हो गयी हैं। मानवीय में मिठास की जगह कड़वाहट ने ले डाली है। आज हम सभ लालची हो चुके हैं.

पश्चिमी सरमाएदारी ने यह दाअवा किया है कि उनीवीं सदी ज्ञान की रोशनी का युग था (एज़ आफ ऐनलाईनमैंट), किन्तु इस सदी में लोग अच्छे मानव नहीं बन पाये, बलिक वह ज़्यादा लोभी, सुआरथी, अधीर, असहिणशील और अभिमानी बन गये हैं तो उस समय को ज्ञान की रोशनी कहने के जगह अज्ञान के अँधेरे का युग कहना ज़्यादा उच्चित होगा। हम अकसर मध्धकाली यूरप को अँधेरे का युग (डारक एजिज़) कहते हैं, किन्तु जितनी मानवी गिरावट और अमानवीकरन पश्चिमी सरमाएदारी ने बीती दो सदियों में किया है, उतना मध्धकाली यूरप में नहीं हुई। विशव के सब से बड़े धर्म (ईसाई) के नेता पोप ने सरमाएदारी की गिरावट पर गहरी चिंता व्यक्त की है. बीती दो सदियों में अगर पश्चिम में कोई अच्छी बात हुई है तो वह है मारकसवाद। मारकसवाद ने पश्चिमी सरमाएदारी की ओर से लाये अमानवीकरन पर गहरी चिंता व्यक्त की है। मुख्य रूप पर मारकसवादी फ़लसफ़ा विकसित होने में तीन अंशों ने योगदान डाला है। आरथिकता, फ़लसफ़ा और समाजवाद यह तीन अंग यूरप के तीन मुख्य देशों से सम्बन्धित है। इंग्लैंड ने आरथिकता, जर्मनी ने फ़लसफ़ा और फरांस ने समाजवाद प्रदान कराएं हैं। जर्मनी के यूरप में फ़लसफ़ा के केंद्र की तरह उन्नत होने का एक कारन यह था कि उस पर सब से पहले पूर्वी फ़लसफ़े का प्रभाव पड़ा. औरंगज़ेब का बड़ा भाई दारा शिकोह संस्कृत और फारसी दोनों का विद्वान था, उस ने वेदों और गीता का अनुवाद फ़ारसी में किया। जर्मनी के ज्यादातर विद्वान फ़ारसी जानते थे। इस लिए उन के लिए यह पूर्वी फ़लसफ़ा उपलब्बध हो गया। यह कहने में शायद अतिकथनी नहीं होगी कि मारकस पर भी पूर्वी फ़लसफ़ा का प्रभाव पड़ा. महात्मा बुद्ध ने पूर्वी फ़लसफ़ा को बहुत ऊँचे स्तर पर पहुँचाया। चीन ने बुद्ध धर्म को अपनाया, माओ पर पूर्वी फ़लसफ़ा का प्रभाव जहाँ कनफ्यूशीअस और ताउवाद आदिक रवायती चीनी फ़लसफ़ा पर डाला, वहां बुद्ध धर्म के फ़लसफ़ा ने जो कि पूर्वी फ़लसफ़ा का लगभग 2500 वर्ष पश्चात हुआ विकसित रूप था, ने भी डाला. जाहिर है कि माओ के पूर्वी फ़लसफ़ा पर पकड़ मारकस और लैनिन जैसे मारकसवादी लीडरों से ज़्यादा ऊँचे स्तर का था और ज़्यादा गहरा था, इस लिए माओ पर पूर्वी फ़लसफ़ा के दो आधारभूत सिद्धांतों सापेखवाद और बहुलवाद का अधिक प्रभाव देखने को मिलता है, श्री गुरु नानक देव जी ने पूर्वी फ़लसफ़ा और रूहानीअत को सिख़र पर पहुँचाया है। उन्होंने हर तरह की सीमाओं जैसे जाति, धर्म, देश, नस्ल और क्षेत्र इत्यादि से ऊपर उठ कर पूरी मानवता और ब्रह्मांड को संबोधित किया। उन के संदेश में व्यापक चिंता और सरबत्त का भला आधार है, आज परिवहन और संचार के साधनों ने जिस्मानी रूप पर संसार को एक संसारक इकाई में बदल दिया है, किन्तु हमारा जिस्मानी फैलाव के साथ हमारी सोच उस स्तर तक विकसित नहीं हो पाई, इस के लिए आजका संसारीकरन अथवा विशवीकरन विश्व दृष्टि पक्ष से रिक्त है। आज के संसारीकरन की एक और बड़ी समस्या यह है कि यह सिर्फ़ आर्थिक संसारीकरन है, इस में नैतिक पक्ष पूरी तरह खाली है। गुरु नानक देव जी की विचारधारा जो कि गुरु ग्रंथ साहब में अंकित है। आज के संसारीकरन की इन दोनों घाटों को पूरी करने में सक्षम है। हमें पूर्वी और  पश्चिमी फ़लसफ़े के नए तत्वों को सम्मिलन करने का यतन करना चाहिए। इस के लिए मारकसवाद का भारतीकरन होना चाहिए। मारकसवाद के आज के समय का सब से विकसित पूर्वी फ़लसफ़ा अर्थात् सिख विचारधारा से सम्मिलत होना चाहिए। लातीनी अमरीका में हमें ऐसा तजुर्बा देखने को मिलता है, वहां मारकसवाद का ईसाई धर्म से सम्मिलन हुआ है, जिस में एक नया फ़लसफ़ा जिस को मोक्ष का धर्म कहा जाता है, हौंद में आया है। यह तजुर्बा बहुत क़ामयाब हुआ है। आज लगभग संपूर्ण संसार में संसारीकरन विपरीत तीक्ष्ण भावना देखने को मिलती है। आज के संसारीकरन में बदलाव लाने की जरूरत है। श्री गुरु नानक देव जी का विश्व भाईचारे का संकल्प ऐसा बदलाव लाने में सही है. मारकसवाद का भारतीकरन और सिख विचारधारा से सम्मिलन  के मार्ग में बड़ी रुकावट है, जैसे कि क्रूर मारकसवाद। कई मारकसवादी अपने आप को मारकसवाद के जन्मदाता समझ लेते हैं, जिस तरह चूहे को हलदी का टुकड़ा मिलने से वह अपने आप को पंसारी समझने लगा था. खुद ही बना मारकसवादी दूसरे के मारकसवाद की समझ पर किंतू-परंतु करना शुरू कर देता है और इस तरह मारकसवाद का आधारभूत सिद्धांत कि ज्ञान का निरंतर विकास होता है जिस को अंग्रेजी में थीऊरी आफ ऐवोल्यूशन आफ नालेज कहते हैं। इस का और बड़ा दुख है कि यह अपनी सोच को वैज्ञानिक सोच कहते हैं, किन्तु समस्या यह है कि इन की वैज्ञानिक सोच उनसिवीं सदी के शुरूआती विज्ञान पर ही अटक कर रह गयी है, जहाँ यह पदार्थ और चेतना में रिश्ता इकतरफ़ा ही समझते हैं और यह पाश्चात्य सोच जिस को यूरेसैंटरिक सोच कहा जा सकता है, में दबे हुए हैं। आईनसटाईन ने तो विज्ञान को ऐबसोल्यूइज़म से रैलेटिवज़म तक पहुँचा दिया जिस को कुआंटम फिज़िकस ने और आगे बढ़ाया, किन्तु यह क्रूर मारकसवादी और नाम की वैज्ञानिक सोच के मालक सोच वहीं अटक क्र रह गई. अगर हम सचमुच मारकसवाद को पूरब के मानवीय विकास के तजुर्बे से और अमीर बनाना चाहते हैं तो हमें कठोरवाद, आरथिकता और सिर्फ नाम की वैज्ञानिक सोच से मुक्त होना पड़ेगा।