पाकि की ओर से सिखों का हमदर्द होने की नाटकीय प्रक्रिया जग्ग जाहिर

sikhsयूनियन जयक की सालगिर्हा से 3 दिन पहले पाकिस्तान की ओर से सिखों का हमदर्द होने की नाटकीय प्रक्रिया 12 अगस्त 2018 को जग्ग जाहिर हुई, जब सैंकड़े सिखों के सम्मेलन में लंदन के टराफलगार सकूएर में भारत ख़िलाफ़ नाअरेबाजी की और पंजाब रैफरैंडम 2020 खालिसतान से अलावा भारतीय झूठे नाअरे लगा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवी खराब करने की कोशिश की। हैरानकुंन है कि आज़ादी का नाअरा बुलंद करने वाले उस स्थल से रैफरैंडम की बात कर रहा थे, जहाँ 1947 में यूनियन जयक तहित अधीनस्थता सवीकार करवाई गयी थी और इस रैली में प्रतिद्वंदी रैली का नामातर भी जिक्र नहीं था। भारत के राष्ट्रीय समाचारपत्र ‘द हिंदू’ ने अपनी एक विवरणिके में खालिसतान के समर्थन में इकट्ठे हुए 2000 समर्थकों के बारे जहाँ खुलासा किया, वहां उन्होंने भारत के समर्थन में इकट्ठे हुए देशवासी लोगों का जिक्र भी किया। इस सम्मेलन को कंटरोल करने के लिए सथानक पुलिस की बड़ी गिनती भी सम्मिलित थी. टराफ़लगार सकूएर में लंदन डैकलारेशन दिवस मनाते हुए रैफ़रैंडम 2020 की बात की, जिस में सिखों के अजाद राष्ट्र को हौंद में लाने का जिक्र था। दूसरी और 200 भारतवासियों की ओर से खालिसतान के विरोध में ढोलक, संगीत, नाच कर समृद्धि का संदेशा दिया और भिन्न भिन्न प्रकार के लंगर लगाये गये। भारतवासियों का सलोगन ‘ सिख्खस फांर्र यूनायटिड इण्डिया ‘, ‘ वी सटैंड फार्र वन यूनायटिड सटरांग इण्डिया ‘, ‘वी वांट द यूनिटी आफ्फ इण्डिया’ था, जिन का मुख्य उद्देश्य भारत की आखंडता को दर्शाना था। यू ऐस ए और कैनेडा से सिख्खस फार्र जसटिस की ओर से खालिसतान रिफरैंडम 2020 और खालिसतान की माँग को और जोर देने के लिए और यू के में इन के बुलारे के तौर में अपना किरदार निभाअ रहा हाऊस आफ्फ लाड्ड के नजीम अहमद ने अपना पाकिसतानी होने का सबूत देते हुए कहा कि, वह खालिसतान की माँग को ले कर अपने सिख भाइयों के साथ है. उन्होंने 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस वाले दिन लंदन की अंबैसी के बाहर भारत विरोधी रैली में भी हिस्सा लिया था। सिख्खस फार्र जसटिस की ओर से शुरू अभियान को, नवम्बर 2020 में करवाया जा रहा है। जो कि पंजाब के अलावा भारत के और शहरों में भी करवाया जाएगा, इस बारे सिख्खस फार्र जसटिस के क़ानूनी सलाहकार गुर्पतवंत सिंह पंनू ने खुलासा किया था। इस सबंध में पंनू को जे सपोट मिली है तो वह पाकिस्तान का गुरुद्वारा करतारपुर साहब है, जहाँ उन्होंने पहला कार्यालय खोला, जहाँ भारतीय नागरिक बिना वीजा से दर्शनों के लिए आएँगे और इन की ओर से खालिसतान का प्रचार किया जाएगा।
ननकाणा साहब, कारतारपुर साहब के इलावा सिखों की भावनायें और धार्मिक स्थान पाकिस्तान में होना कारण पाकिस्तान से सिखों का गहरा सबंध है और पाकिस्तान के भी सिखों में रुच्ची का मुख्य कारण यह है। पाकिस्तान की धरती से सिखों के मुख्य दिवस मनाये जाते हैं। यहाँ तक कि लाहौर शहर की नींव भी सिख समराज की ओर से बँधी थी और सिखों के पहले गुरु जी की जन्म भूमि भी पाकिस्तान करतारपुर में है। इन कारणों की वजह से पाकिस्तान सिखों को लुभाता रहा है। 1947 के विभाजन के उपरान्त 36 % हिंदू और मुसलमानों की बसावट का विभाजन तो हुआ, किन्तु 2002 में दरज हुई मरदमशुमारी के अनुसार पाकिस्तान में 6146 सिख थे और मौजूदा हालातों के दौरान अमेरिका को दर्ज करवाये आँकड़ों के अनुसार सिखों की गिनती 20000 है। सिखों की बड़ी गिनती अमेरिका, कैनेडा, यू के और अरब देशों में भी है। अगर इन रिश्तों को और खोजा जाए तो सिख सदियों से पाकिस्तान और मुसलमानों के ख़िलाफ़ लड़ता रहा है। घल्लूघारे दौरन भी सिखों ने डट कर पाकिसतानी दंगाकार्यं का मुकाबला किया। इस के इलावा पाकिस्तान से हुईं जंगों में सिख सूरमों ने पाकिसतानी फौज के दाँत खट्टे किये हैं। पाकिस्तान सिखों को अतीव पसंद नहीं करता, किन्तु भारत के ख़िलाफ़ बरतने के लिए उन के पास इस से बढ़िया हथियार भी कोई नहीं। पारस्परिक पाड़ डाल राज्य करने का नीती पर चल रहा पाकसितान सिखों के अक्स को धुँधला करने की आड़ में है।
पाकसितान फौज नहीं भूली होगी, लैफटीनैंट जनरल जगजीत सिंह का जौहर, जिनहोने 1971 की 16 दिसम्बर को पाकी फौज के घुटने टिका दिए थे।
इस जंग में 90000 पाकिसतानी और बंगाली फौजियों ने आतम समर्पण किया था। द्वितीय विश्व युद्ध से पश्चात यह पहली बार हुआ था, जिस में फौज की इतनी बड़ी गिनती ने सिर झुका कर पराजय मानी हो। क़ानूनी सलाहकार पंनू शायद पाकिस्तान को यह बताना नहीं भूलेंगे। पाकिस्तान के भूतपूर्व मुख्खी जयाउल्ल हक्कणा ने भी 70 के दशक में खालिसतान समर्थन का मुद्दा उभारा था, जयाउल्ल हक्क भारत को नीचा दिखाने की धुन में था, किन्तु अपने स्वारथ को देखते हुए उस मौक़े के लीडर को बिना बताये पलट गया और सिख लीडर को शिखर पहुंचा सीढ़ी खींच ली. ऐसे ही हालात अब पैदा होने का खदशा है, जिस में सिख भाईचारे की तस्वीर धुँधला करने का कार्य पाकिस्तान की ओर से शुरू हो चूका है। पाकिस्तान में स्कूली बच्चों को पढ़ाये जाने वाली किताब में सिखों और सिख गुरुओं के किरदार का जिक्र न कभी था और न है। उन को किसी और धर्म की सीख और जानकारी से जोड़ने की इजाजत नहीं, जबकि भारत बहुसंस्कृति वाला देश है।