प्रगतिशील और उज्जवल भारत में ही पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित है !

indiaकुछ समय पहले यूरोप दुनिया का सब से प्रोन्नत इलाका मानयां जाता था, आर्थिक उन्नती सामाजिक तरक्की, शांति और सभ्यता का प्रतीक माना जाता था, लेकिन सिर्फ़ पिछले तीन-चार वर्षों में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति ने जो रूप अख़्तियार किया है, उस से यह सब एक भ्रम जैसा लगना शुरू हो गया है। आज यूरोप फिर भी आर्थिक और राजनीति रूप पर प्रगतिशील है, लेकिन उस के पड़ोसी इलाकों में जो घट रहा है उस की काली प्रछाई यूरोप की भव्यता को ग्रहिण जैसे प्रतीत हो रही है। सिर्फ़ यहाँ ही बस नहीं जो अंतर्राष्ट्रीय ढाँचा यूरोप और उस के सहयोगी अमेरिके ने बनाया था, वह भी डगमगाता लग रहा है। यह अंतर्राष्ट्रीय ढाँचा जिस का नीवं धर्म निरपख्खता और अन्तर्राष्ट्रीय सदभावना पर रखीं गयी थी, आज वही धर्म के नाम पर की राजनीति कारण खोखली होते नजर आ रही हैं। आज इंसानियत लज्जित हो रही है, धर्म के नाम पर इन्सान एक दूसरे का दुश्मन बना है।
आज जमहूरीअत और इंसानियत को भूल कर धार्मिक गुरु लोगों को उलझा रहे हैं और देशों को बरबाद कर रहे हैं। इस तरह के कई देश जो पश्चिम के द्वारा दिये गये धर्म निरपक्ष के क़ानूनी ढाँचे पर खड़े थे, आज वही देश धर्म की राजनीति के कारण अपनी हौंद गँवाने किनारे खड़े हैं। ऐसी असंख्य उदाहरण हमारे समक्ष है जैसे इराक, लीबिया, सीरीआ, यमन इत्यादि। इन की दुर्दशा देख कर दिल दहल जाता है। आये दिन इन देशों से हज़ारों लोग आवासहीन हो रहे हैं। आज बड़ा सवाल सामने आ रहा है, जो धर्म के नाम पर मौजूदा देशों की सरहदों को मिटा रहा है, अथवा नई सरहदें कायम करने की कोशिस कर रहा है, उस का खमियाजा कौन भुगतेगा ? क्या धर्म ही देश को कायम करने का आधार है अथवा फिर धर्म के नाम पर प्रोन्नत और स्थापित अंतर्राष्ट्रीय ढाँचे में मौजूदा देशों को मिटाने का कारण बन रहा है ? दुनिया गवाह है कि आज धर्म और राजनीति का मिशरन सब से अधिक घातक सिद्ध हो रहा है।
यह कोई हैरानीजनक बात नहीं है कि दुनिया के इस तरह के हालातों में भारत विशिष्ट उदाहरण सिद्ध हो रहा है। आज जहाँ धर्म और कौम के नाम पर दुनिया भर में मारकट्ट मची है, वहां ही भारत का उन्नत और बहु-संसकृतक रूप समूची दुनिया के लिए एक प्रेरणा बन के उबर रहा है। यह वह देश है जिस ने हिंदू, मुसलमान, सिख अथवा ईसाई धर्म में कभी कोई वितकरा नहीं किया। भारत का संविधान धर्म निरपक्ष होते हुए भी संपूर्ण धर्मों को समान का रुत्तबा देता है। ऐसी कार्रवाई दुनिया में सिर्फ़ भारत देश में ही संभव है, बावजूद इस के कि देश के अन्दर 80 प्रतीशत हिंदू होते हुए भी मुसलमान राष्ट्रपति चुने गये और एक सिख को प्रधान मंत्री बनाया गया, ईसाई को देश का सब से बड़ा राजनीतक पार्टी का मुखिया बनने का मौक़ा देना यह सिद्ध करता है कि भारत देश सब भारतीयों का सांझा देश है।
ऐसे तथ्यों को देखते हुए हैरानी होती है कि कुछ गुंमराहकुंन लोग धर्म को अपने आत्मगत मुफ़ाद के लिए बरत रहे हैं। यह लोग भारतीअता को विसार कर धर्म को मोहरा बनाते हैं, पर विचार करने वाली बात है कि जो देश भी धर्म को प्रमुख रख कर हौंद में आते हैं। ऐसे देशों का नींव हमेशां ही कच्ची रहती हैं। भारत देश में हर भारतीय का वर्तमान ही नहीं बल्कि भविष्य भी उज्जवल और सुरक्षित है। भारत देश में अगर बहादुर कौम की बात की जाये तो उस में सब से पहले सिख कौम का नाम अपने आप ही साहमने आता है। सिख कौम भारत का गर्व ही नहीं वरन् मज़बूत नींव भी है, जिस को हिलाने के लिए एकों ऐसे देश के पिछले कुछ समय से माँग काफ़ी जोौर पकड़ रही है, किन्तु इस मुद्दे को उठाने वाला ऐसा प्रतीत होता है कि वह अथवा तो यह कार्रवाई अज्ञानता वश कर रहा हैं अथवा फिर वह धर्म के नाम पर आप गुंमराह हो कर दूसरे को भटका रहा है. अपने हक्क की माँग करना कोई गलत नहीं, पर अपनी माँग के लिए देश का विभाजन समुचित नहीं। वह भी उस देश का जो कि सब धर्मों का सांझा और जमहूरीअत का जीता जागता हुआ प्रतीक है।
अजोके समय में अंतर्राष्ट्रीय अवस्थाओं को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता, जब कि पूरी दुनिया में धर्म के नाम पर हाहाकार मची है, ऐसे में धर्म को मुद्दा बना कर विभक्त देश की माँग करना अपने ही धर्म को नीचा दिखाने के समान है। भारतीय लोग जो कि कुछ गुंमराह हो रहा हैं, उन को भारत के इतिहास को अच्छी तरह खोद कर देखने की जरूरत है। कभी समय था कि भारत की सरहदें क़ाबुल कंधार तक थीं और आज कुछ ऐसी ताक़तों के बदौलत ही भारत देश के कितने टुकड़े धर्म को मुख्य रख कर ही किये गये, पर क्या जिन कारणों के कारण भारत देश को समय-समय पर बँटा गया, वह मसले का समाधान बने ? उदाहरण के तौर पाकिस्तान का हशर उन सब ताक़तों का पोल खोलता है जो कि धर्म के नाम पर विभक्त देश बनाना ही जायज़ ठहरा रहे थे।
इन सब के मद्देनज़र आप सभ ने अब यह सोचना है कि हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य कहाँ सुरक्षित है। एक प्रगतिशील और उज्जवल भारत में अथवा फिर धर्म के संविदाकारों के द्वारा दिखाये जा रहे सपनों से, यह निरणय अब हमें करना है, किन्तु यह याद रहे हमारा एक गलत कदम का खमियाजा हमारी आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ सकता है।